रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
कहीं कहीं शीशे पर
जमी हुई सी धूल हट जाती है .
उस साफ़ हुए शीशे से
दीखते हैं कई अक्स साफ़ साफ़ .
हर नज़र को कुछ कहने के लिए
एक राह सी मिल जाती है .
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
कहीं कहीं शीशे पर
जमी हुई सी धूल हट जाती है .
उस साफ़ हुए शीशे से
दीखते हैं कई अक्स साफ़ साफ़ .
हर नज़र को कुछ कहने के लिए
एक राह सी मिल जाती है .
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
हवाओं ने जब जब
तिनकों को उड़ाया है .
कुछ रिश्तों ने तब तब
हाथ आगे बढाया है .
जिन्हें थाम कर हमने भी
कई बार खुद को बचाया है .
ये सरमाया है खुदा का भी
जो दुवाओं मे अक्सर
हमने इन रिश्तों को पाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
तिनकों को उड़ाया है .
कुछ रिश्तों ने तब तब
हाथ आगे बढाया है .
जिन्हें थाम कर हमने भी
कई बार खुद को बचाया है .
ये सरमाया है खुदा का भी
जो दुवाओं मे अक्सर
हमने इन रिश्तों को पाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
कई बार खेतों की
मेढ़ों पर चले हैं हम -
बहुत संभल -२ कर ,
इन मेढ़ों के संग हमने
पग -डंडियों को पाया है .
कभी पाँव के काँटों को
हाथों से निकला है ,
कभी हाथों के छालों को
पानी से धो डाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
मेढ़ों पर चले हैं हम -
बहुत संभल -२ कर ,
इन मेढ़ों के संग हमने
पग -डंडियों को पाया है .
कभी पाँव के काँटों को
हाथों से निकला है ,
कभी हाथों के छालों को
पानी से धो डाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
जैसे पेड़ों की शाखों से
पत्ते गिरे हों टूट कर ,
ऐसे ही कुछ गिरते हुओं को
कई बार कुछ बाँहों ने
दुपट्टे मे संभाला है .
एक माँ की गोद ने
बिलखते को संभाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
पत्ते गिरे हों टूट कर ,
ऐसे ही कुछ गिरते हुओं को
कई बार कुछ बाँहों ने
दुपट्टे मे संभाला है .
एक माँ की गोद ने
बिलखते को संभाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
एक बस्ते मे किताबें भर के
जायें तो मदरसे तक .
इन फटे जूतों को देख कर
जिसने हमें कंधे पे उठाया है .
वो बूढी सी आँखों वाला ,
नाक पर चश्मा लिए
हर वक्त जिसने हमारे
सब नखरों को उठाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
जायें तो मदरसे तक .
इन फटे जूतों को देख कर
जिसने हमें कंधे पे उठाया है .
वो बूढी सी आँखों वाला ,
नाक पर चश्मा लिए
हर वक्त जिसने हमारे
सब नखरों को उठाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
कुछ रिश्ते इंसानियत से भी हैं -
जो हमें जीवन मे बहुत कुछ सिखाते हैं ,
कभी बहुत रुलाते हैं ,
कभी बहुत हँसाते हैं .
ये रिश्ते कहीं न कहीं
कुछ दोस्त भी कहलाते हैं .
इन रिश्तों से मिलते ही
होठों को हसीं मिल पाती है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
जो हमें जीवन मे बहुत कुछ सिखाते हैं ,
कभी बहुत रुलाते हैं ,
कभी बहुत हँसाते हैं .
ये रिश्ते कहीं न कहीं
कुछ दोस्त भी कहलाते हैं .
इन रिश्तों से मिलते ही
होठों को हसीं मिल पाती है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
Posted on Dainik Jagran Junction (Blog) by ;- shruti mohan
श्रुति मोहन