रविवार, 26 फ़रवरी 2012

उम्मीद ...

उम्मीद ...एक आशा 



एक परिंदा जो 
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ,
डरता था कहीं ये 
समंदर ही निगल ना ले ,
वो ऊँचाइयों से डरता था ।

फिर नदी ने सिखाया उसे 
कैसे ऊंचाई से गिरना है ,
गिरकर भी चट्टानों की छाती पर
शान से बहना है ।

फिर हवाओं ने समझाया उसे  ,
कैसे गूंज के बहना है ।
राहों मे खड़े हो बेशक 
वृक्ष कितने भी विशालकाय ,
एक ना एक दिन उनको तो 
जड़ से ही निकलना है ।

फिर माँ ने परिंदे को 
बड़े प्यार से सहलाया ,
उसे उम्मीद ना छोड़ने का -रहस्य समझाया ।
बेटा ये उम्मीद ही जीवन मे ,
एक राह दिखाती है ।
एक उम्मीद ही आशा की 
बड़ी करामात कर जाती है ।

ये सुनकर परिंदे ने 
उम्मीद से पर खोले ,
आकाश के दामन मे 
लेते हुए हिचकोले ।
थोड़ा निचे गिरते ही 
क्या खूब उसने खुद को
 संभाला  है ।

आज माँ की उम्मीदों 
ने उस परिंदे को उड़ा डाला है ।
ये वही परिंदा था , 
जो एक बार -
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ।


श्रुति मोहन 



एक सहेली ....

एक सहेली ....

एक सहेली जो कहीं खो सी गयी है ,
हस्ते हस्ते फिर रो सी गयी है ,
क्या है मन मे उसके !
क्यों खामोश सी दिखती है ?
क्यों मुस्कान उसकी ,
 कहीं सो सी गयी है !

जब वो हँसती थी तो ,
हँसते थे- सरसों के फूल भी ,
जो  वो उदास हो जाये कभी तो,
थम जाती थी-
हवाओं मे उड़ती धूल भी ,
क्यों आज मौसम की किताबों से ,
वक्त की घड़ियाँ भी
कहीं खो सी गयी हैं !


उन प्यारी सी आँखों मे सपने थे
कई उजले ,
आज कुछ उलझन हैं
खमोशी के परदे हैं  ,
शब्द भी अब ना जाने क्यों
 डर डर कर
फूटते हैं अधरों से ,
उस आह के दरिया से क्यों ,
ये आंखें कहीं धुल सी गयी हैं !

क्यों एक सहली मेरी कहीं खो सी गयी है ,
हँसते हँसते फिर रो सी गयी है ।


श्रुति मोहन






बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

खुशियाँ कहाँ हैं ....

कहीं आतिशबाजी  है ,कहीं पे खुशियाँ हैं,
कहीं पे उड़ते परिंदे हैं ,
कहीं पे दिन खूबसूरत हैं,
 दुनिया रंगों मे डूबी है .

तो क्यों कुछ गलियाँ रंजों मे खोई  हैं ,
क्यों दर्दनाक धमाकों से गूंजी ये धरती है, 
क्यों पटाके बम मे बदले हैं ,
क्यों बदली सी  भाषा है ,
कहीं बढती निराशा है .

अँधेरा गुप्प हुआ जाता क्यूँ है ?
ये तारे क्यूँ धूमिल हैं ,
कहाँ वो खुशियाँ  छुपी हैं .

शाम की मुस्कराहट थमी है ,
दिखते नहीं परिंदे भी अब ,
इस धुयें  से क्यूँ गले रुंधे हैं ,
कहाँ वो पल बंधे हैं ,
कहाँ वो आतिशबाजी है ,कहाँ वो खुशियाँ हैं|

श्रुति मोहन