उम्मीद ...एक आशा
एक परिंदा जो
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ,
डरता था कहीं ये
समंदर ही निगल ना ले ,
वो ऊँचाइयों से डरता था ।
फिर नदी ने सिखाया उसे
कैसे ऊंचाई से गिरना है ,
गिरकर भी चट्टानों की छाती पर
शान से बहना है ।
फिर हवाओं ने समझाया उसे ,
कैसे गूंज के बहना है ।
राहों मे खड़े हो बेशक
वृक्ष कितने भी विशालकाय ,
एक ना एक दिन उनको तो
जड़ से ही निकलना है ।
फिर माँ ने परिंदे को
बड़े प्यार से सहलाया ,
उसे उम्मीद ना छोड़ने का -रहस्य समझाया ।
बेटा ये उम्मीद ही जीवन मे ,
एक राह दिखाती है ।
एक उम्मीद ही आशा की
बड़ी करामात कर जाती है ।
ये सुनकर परिंदे ने
उम्मीद से पर खोले ,
आकाश के दामन मे
लेते हुए हिचकोले ।
थोड़ा निचे गिरते ही
क्या खूब उसने खुद को
संभाला है ।
आज माँ की उम्मीदों
ने उस परिंदे को उड़ा डाला है ।
ये वही परिंदा था ,
जो एक बार -
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ।
श्रुति मोहन