सोमवार, 22 अप्रैल 2013

मंगलवार, 19 मार्च 2013

भीगी पलकें

भीगी पलकें.......

जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं 
अन्तःमन  के जज़्बातों को अदायगी से बेपर्दा करती हैं .
तब देखने वालों के दिल का आलम कुछ ख़ास होता है .

अजीबोगरीब दिल की हालत रहती है -
दिल की हूक से किसी का दिल मासूमियत से  धड़कता है ,
किसी को रोता देख..... किसी का दिल तड़पता है .

ख़ामोशी से आंखों  के मोतियों को पोंछे भी तो कैसे ?
एक मोती के गिरने  के बाद एक और मोती के गिरने का आभास होता है .
अब नज़र से ही क्यूँ न उन्हें समझाने की कोशिश कर लें ,
उनसे नज़र मिला कर उनसे कुछ नज़रों ही में गुफ्तगू कर लें ,
मगर ये ज़माना उस ओर उठी हर नज़र को गुस्ताख नज़र कहता है .
उनकी भीगी पलकों से भीगा सारा शहर गीला लगता है . 

बस अब खुदा  ही है जो शायद थोडा रहम करे ,
उनकी पलकों से बहते  आंसुओं को थोडा कम करे .
वो खुश रहे हर मौसम में ,
बेशक बरसात इस बार थोड़ी कम रहे .

अब तो उनकी आँखों में बसंत देखने की चाहत है ,
जिसमें  मन उपवन में सरसों खूब खिलती है ,
ख़ुशी अधरों के साथ साथ पलकों में भी झलकती है .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं ........                        
                                                                                                   .श्रुति मोहन ...19-03-2013

रविवार, 15 अप्रैल 2012

रिश्तों में भरी मिठास से....


रिश्तों में भरी मिठास से 
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .
कहीं कहीं शीशे पर
जमी हुई सी धूल हट जाती है .
उस साफ़ हुए शीशे से
दीखते हैं कई अक्स साफ़ साफ़ .
हर नज़र को कुछ कहने के लिए
एक राह सी मिल जाती है .
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .


हवाओं ने जब जब
तिनकों को उड़ाया है .
कुछ रिश्तों ने तब तब
हाथ आगे बढाया है .
जिन्हें थाम कर हमने भी
कई बार खुद को बचाया है .
ये सरमाया है खुदा का भी
जो दुवाओं मे अक्सर
हमने इन रिश्तों को पाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .


कई बार खेतों की
मेढ़ों पर चले हैं हम -
बहुत संभल -२ कर ,
इन मेढ़ों के संग हमने
पग -डंडियों को पाया है .
कभी पाँव के काँटों को
हाथों से निकला है ,
कभी हाथों के छालों को
पानी से धो डाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .


जैसे पेड़ों की शाखों से
पत्ते गिरे हों टूट कर ,
ऐसे ही कुछ गिरते हुओं को
कई बार कुछ बाँहों ने
दुपट्टे मे संभाला है .
एक माँ की गोद ने
बिलखते को संभाला है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .


एक बस्ते मे किताबें भर के
जायें तो मदरसे तक .
इन फटे जूतों को देख कर
जिसने हमें कंधे पे उठाया है .
वो बूढी सी आँखों वाला ,
नाक पर चश्मा लिए
हर वक्त जिसने हमारे
सब नखरों को उठाया है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .


कुछ रिश्ते इंसानियत से भी हैं -
जो हमें जीवन मे बहुत कुछ सिखाते हैं ,
कभी बहुत रुलाते हैं ,
कभी बहुत हँसाते हैं .
ये रिश्ते कहीं न कहीं
कुछ दोस्त भी कहलाते हैं .
इन रिश्तों से मिलते ही
होठों को हसीं मिल पाती है .
ये रिश्ते ही तो हैं -
रिश्तों में भरी मिठास से
हमारे जीवन मे भी मिठास घुल जाती है .

Posted on Dainik Jagran Junction (Blog) by ;- shruti mohan 
श्रुति मोहन

गुरुवार, 1 मार्च 2012

भीगी सी पलक पर.....

भीगी सी पलक पर ठहरा सा इक सितारा 
वक़्त की आँखों से फिसलता एक लम्हा बेचारा 
कुछ महसूस ही नहीं कर पाता ,
वो किस्मत का था मारा .
जब गिरने लगे तारे पलकों से मोती बन कर ,
जिसपर भी ये पड़े जानिब वो माथा हमारा ,
हम माथे से मोती पोंछें ,
या के हाथों से हटाए तारों को ही देखें ,
उस पल की कयामत पर ,हमने दिल हारा...हमने दिल हारा ....
भीगी सी पलक पर ठहरा सा इक तारा ....


श्रुति मोहन  

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

उम्मीद ...

उम्मीद ...एक आशा 



एक परिंदा जो 
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ,
डरता था कहीं ये 
समंदर ही निगल ना ले ,
वो ऊँचाइयों से डरता था ।

फिर नदी ने सिखाया उसे 
कैसे ऊंचाई से गिरना है ,
गिरकर भी चट्टानों की छाती पर
शान से बहना है ।

फिर हवाओं ने समझाया उसे  ,
कैसे गूंज के बहना है ।
राहों मे खड़े हो बेशक 
वृक्ष कितने भी विशालकाय ,
एक ना एक दिन उनको तो 
जड़ से ही निकलना है ।

फिर माँ ने परिंदे को 
बड़े प्यार से सहलाया ,
उसे उम्मीद ना छोड़ने का -रहस्य समझाया ।
बेटा ये उम्मीद ही जीवन मे ,
एक राह दिखाती है ।
एक उम्मीद ही आशा की 
बड़ी करामात कर जाती है ।

ये सुनकर परिंदे ने 
उम्मीद से पर खोले ,
आकाश के दामन मे 
लेते हुए हिचकोले ।
थोड़ा निचे गिरते ही 
क्या खूब उसने खुद को
 संभाला  है ।

आज माँ की उम्मीदों 
ने उस परिंदे को उड़ा डाला है ।
ये वही परिंदा था , 
जो एक बार -
घर वापिस आ ना सका ।
परों को फैला कर भी ,
एक ऊँची उड़ान पा ना सका ।


श्रुति मोहन 



एक सहेली ....

एक सहेली ....

एक सहेली जो कहीं खो सी गयी है ,
हस्ते हस्ते फिर रो सी गयी है ,
क्या है मन मे उसके !
क्यों खामोश सी दिखती है ?
क्यों मुस्कान उसकी ,
 कहीं सो सी गयी है !

जब वो हँसती थी तो ,
हँसते थे- सरसों के फूल भी ,
जो  वो उदास हो जाये कभी तो,
थम जाती थी-
हवाओं मे उड़ती धूल भी ,
क्यों आज मौसम की किताबों से ,
वक्त की घड़ियाँ भी
कहीं खो सी गयी हैं !


उन प्यारी सी आँखों मे सपने थे
कई उजले ,
आज कुछ उलझन हैं
खमोशी के परदे हैं  ,
शब्द भी अब ना जाने क्यों
 डर डर कर
फूटते हैं अधरों से ,
उस आह के दरिया से क्यों ,
ये आंखें कहीं धुल सी गयी हैं !

क्यों एक सहली मेरी कहीं खो सी गयी है ,
हँसते हँसते फिर रो सी गयी है ।


श्रुति मोहन






बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

खुशियाँ कहाँ हैं ....

कहीं आतिशबाजी  है ,कहीं पे खुशियाँ हैं,
कहीं पे उड़ते परिंदे हैं ,
कहीं पे दिन खूबसूरत हैं,
 दुनिया रंगों मे डूबी है .

तो क्यों कुछ गलियाँ रंजों मे खोई  हैं ,
क्यों दर्दनाक धमाकों से गूंजी ये धरती है, 
क्यों पटाके बम मे बदले हैं ,
क्यों बदली सी  भाषा है ,
कहीं बढती निराशा है .

अँधेरा गुप्प हुआ जाता क्यूँ है ?
ये तारे क्यूँ धूमिल हैं ,
कहाँ वो खुशियाँ  छुपी हैं .

शाम की मुस्कराहट थमी है ,
दिखते नहीं परिंदे भी अब ,
इस धुयें  से क्यूँ गले रुंधे हैं ,
कहाँ वो पल बंधे हैं ,
कहाँ वो आतिशबाजी है ,कहाँ वो खुशियाँ हैं|

श्रुति मोहन