रविवार, 26 फ़रवरी 2012

एक सहेली ....

एक सहेली ....

एक सहेली जो कहीं खो सी गयी है ,
हस्ते हस्ते फिर रो सी गयी है ,
क्या है मन मे उसके !
क्यों खामोश सी दिखती है ?
क्यों मुस्कान उसकी ,
 कहीं सो सी गयी है !

जब वो हँसती थी तो ,
हँसते थे- सरसों के फूल भी ,
जो  वो उदास हो जाये कभी तो,
थम जाती थी-
हवाओं मे उड़ती धूल भी ,
क्यों आज मौसम की किताबों से ,
वक्त की घड़ियाँ भी
कहीं खो सी गयी हैं !


उन प्यारी सी आँखों मे सपने थे
कई उजले ,
आज कुछ उलझन हैं
खमोशी के परदे हैं  ,
शब्द भी अब ना जाने क्यों
 डर डर कर
फूटते हैं अधरों से ,
उस आह के दरिया से क्यों ,
ये आंखें कहीं धुल सी गयी हैं !

क्यों एक सहली मेरी कहीं खो सी गयी है ,
हँसते हँसते फिर रो सी गयी है ।


श्रुति मोहन






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