बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

खुशियाँ कहाँ हैं ....

कहीं आतिशबाजी  है ,कहीं पे खुशियाँ हैं,
कहीं पे उड़ते परिंदे हैं ,
कहीं पे दिन खूबसूरत हैं,
 दुनिया रंगों मे डूबी है .

तो क्यों कुछ गलियाँ रंजों मे खोई  हैं ,
क्यों दर्दनाक धमाकों से गूंजी ये धरती है, 
क्यों पटाके बम मे बदले हैं ,
क्यों बदली सी  भाषा है ,
कहीं बढती निराशा है .

अँधेरा गुप्प हुआ जाता क्यूँ है ?
ये तारे क्यूँ धूमिल हैं ,
कहाँ वो खुशियाँ  छुपी हैं .

शाम की मुस्कराहट थमी है ,
दिखते नहीं परिंदे भी अब ,
इस धुयें  से क्यूँ गले रुंधे हैं ,
कहाँ वो पल बंधे हैं ,
कहाँ वो आतिशबाजी है ,कहाँ वो खुशियाँ हैं|

श्रुति मोहन 

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