कहीं आतिशबाजी है ,कहीं पे खुशियाँ हैं,
कहीं पे उड़ते परिंदे हैं ,
कहीं पे दिन खूबसूरत हैं,
दुनिया रंगों मे डूबी है .
तो क्यों कुछ गलियाँ रंजों मे खोई हैं ,
क्यों दर्दनाक धमाकों से गूंजी ये धरती है,
क्यों पटाके बम मे बदले हैं ,
क्यों बदली सी भाषा है ,
कहीं बढती निराशा है .
अँधेरा गुप्प हुआ जाता क्यूँ है ?
ये तारे क्यूँ धूमिल हैं ,
कहाँ वो खुशियाँ छुपी हैं .
शाम की मुस्कराहट थमी है ,
दिखते नहीं परिंदे भी अब ,
इस धुयें से क्यूँ गले रुंधे हैं ,
कहाँ वो पल बंधे हैं ,
कहाँ वो आतिशबाजी है ,कहाँ वो खुशियाँ हैं|
श्रुति मोहन
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