साहित्य-मन: महान पत्रकार अखिलेश मिश्र जी की याद
------------...: महान पत्रकार अखिलेश मिश्र जी की याद ------------------------------------------ स्वनामधन्य मूर्धन्य पत्रकार एवं सम्पादकाचार्य आदरणीय...
सोमवार, 22 अप्रैल 2013
मंगलवार, 19 मार्च 2013
भीगी पलकें
भीगी पलकें.......
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं
अन्तःमन के जज़्बातों को अदायगी से बेपर्दा करती हैं .
तब देखने वालों के दिल का आलम कुछ ख़ास होता है .
अजीबोगरीब दिल की हालत रहती है -
दिल की हूक से किसी का दिल मासूमियत से धड़कता है ,
किसी को रोता देख..... किसी का दिल तड़पता है .
ख़ामोशी से आंखों के मोतियों को पोंछे भी तो कैसे ?
एक मोती के गिरने के बाद एक और मोती के गिरने का आभास होता है .
अब नज़र से ही क्यूँ न उन्हें समझाने की कोशिश कर लें ,
उनसे नज़र मिला कर उनसे कुछ नज़रों ही में गुफ्तगू कर लें ,
मगर ये ज़माना उस ओर उठी हर नज़र को गुस्ताख नज़र कहता है .
उनकी भीगी पलकों से भीगा सारा शहर गीला लगता है .
बस अब खुदा ही है जो शायद थोडा रहम करे ,
उनकी पलकों से बहते आंसुओं को थोडा कम करे .
वो खुश रहे हर मौसम में ,
बेशक बरसात इस बार थोड़ी कम रहे .
अब तो उनकी आँखों में बसंत देखने की चाहत है ,
जिसमें मन उपवन में सरसों खूब खिलती है ,
ख़ुशी अधरों के साथ साथ पलकों में भी झलकती है .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं ........
.श्रुति मोहन ...19-03-2013
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