मंगलवार, 19 मार्च 2013

भीगी पलकें

भीगी पलकें.......

जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं 
अन्तःमन  के जज़्बातों को अदायगी से बेपर्दा करती हैं .
तब देखने वालों के दिल का आलम कुछ ख़ास होता है .

अजीबोगरीब दिल की हालत रहती है -
दिल की हूक से किसी का दिल मासूमियत से  धड़कता है ,
किसी को रोता देख..... किसी का दिल तड़पता है .

ख़ामोशी से आंखों  के मोतियों को पोंछे भी तो कैसे ?
एक मोती के गिरने  के बाद एक और मोती के गिरने का आभास होता है .
अब नज़र से ही क्यूँ न उन्हें समझाने की कोशिश कर लें ,
उनसे नज़र मिला कर उनसे कुछ नज़रों ही में गुफ्तगू कर लें ,
मगर ये ज़माना उस ओर उठी हर नज़र को गुस्ताख नज़र कहता है .
उनकी भीगी पलकों से भीगा सारा शहर गीला लगता है . 

बस अब खुदा  ही है जो शायद थोडा रहम करे ,
उनकी पलकों से बहते  आंसुओं को थोडा कम करे .
वो खुश रहे हर मौसम में ,
बेशक बरसात इस बार थोड़ी कम रहे .

अब तो उनकी आँखों में बसंत देखने की चाहत है ,
जिसमें  मन उपवन में सरसों खूब खिलती है ,
ख़ुशी अधरों के साथ साथ पलकों में भी झलकती है .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं .
जब भीगी भीगी सी पलकें आपस में मिलती हैं ........                        
                                                                                                   .श्रुति मोहन ...19-03-2013